काजू की खेती कैसे करें: काजू उत्पादन से किसान बन सकते हैं मालामाल

Published On: February 16, 2026
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How to cultivate cashew

काजू (Anacardium occidentale L.) की उत्पत्ति पूर्वी ब्राज़ील मानी जाती है। वहां से यह फसल धीरे-धीरे दुनिया के कई देशों में पहुंची। भारत में काजू की शुरुआत सबसे पहले गोवा में हुई, और यहीं से इसका विस्तार अन्य राज्यों में हुआ। आज भारतीय काजू अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और स्वाद के कारण वैश्विक बाजार में खास पहचान रखता है।

भारत: काजू का अग्रणी उत्पादक और निर्यातक

भारत काजू उत्पादन में अग्रणी देशों में शामिल है। इतना ही नहीं, देश काजू प्रोसेसिंग और निर्यात के क्षेत्र में भी शीर्ष स्थान रखता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय काजू की भारी मांग है, जिससे यह किसानों के लिए एक लाभकारी नकदी फसल बन चुकी है।

भारत में काजू उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र

भारत में काजू की खेती मुख्य रूप से तटीय क्षेत्रों में की जाती है:

पश्चिमी तट

  • केरल
  • कर्नाटक
  • गोवा
  • महाराष्ट्र

पूर्वी तट

  • तमिलनाडु
  • आंध्र प्रदेश
  • उड़ीसा
  • पश्चिम बंगाल

नए उभरते क्षेत्र

  • छत्तीसगढ़
  • झारखंड
  • उत्तर-पूर्वी राज्य (असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड)
  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह

उपयुक्त जलवायु और मिट्टी

काजू की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली गहरी रेतीली दोमट और लेटराइट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। भारी चिकनी मिट्टी उपयुक्त नहीं होती, क्योंकि काजू का पौधा जलभराव सहन नहीं कर पाता।

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यह फसल 20°C से 38°C तापमान, 60–95% आर्द्रता और 2000–3500 मिमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में बेहतर उत्पादन देती है। चूंकि यह उष्णकटिबंधीय पौधा है, इसलिए गर्म और आर्द्र वातावरण इसकी वृद्धि के लिए जरूरी है।

बाग लगाने से पहले भूमि की तैयारी

नए काजू बाग की स्थापना से पहले भूमि की सही तैयारी करना आवश्यक है:

  • अप्रैल–मई की प्री-मानसून वर्षा से पहले खेत की सफाई करें।
  • खूंटियों की सहायता से गड्ढों के स्थान चिन्हित करें।
  • 60×60×60 सेमी आकार के गड्ढे खोदकर लगभग 15 दिनों तक खुला छोड़ दें, ताकि सूर्य और हवा का प्रभाव मिल सके।

रोपण की पद्धतियां

1. सामान्य रोपण पद्धति

  • दूरी: 7×7 मीटर
  • पौधों की संख्या: लगभग 204 प्रति हेक्टेयर

2. उच्च घनत्व रोपण

  • दूरी: 5×5 मीटर
  • पौधों की संख्या: लगभग 400 प्रति हेक्टेयर

उन्नत काजू किस्में

भारत में कई उच्च उपज देने वाली किस्में विकसित की गई हैं। प्रमुख किस्में इस प्रकार हैं:

  • ओए-1 (बल्ली-2)
  • वेंगुरला-4
  • वेंगुरला-7
  • उल्लाल-2
  • उल्लाल-4
  • बीपीपी-1
  • बीपीपी-2
  • टी-40

इसके अतिरिक्त W-180 किस्म को “काजू का राजा” कहा जाता है। इसमें पाए जाने वाले बायोएक्टिव कंपाउंड स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं।

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खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

अच्छी पैदावार के लिए संतुलित पोषण जरूरी है:

  • पहले वर्ष: प्रति पौधा 70 ग्राम फॉस्फेट, 200 ग्राम यूरिया और 300 ग्राम पोटाश दें।
  • आगे के वर्षों में: पौधे की वृद्धि के अनुसार मात्रा बढ़ाएं।
  • गोबर की सड़ी खाद का प्रयोग मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायक है।

खरपतवार नियंत्रण और कीट प्रबंधन पर नियमित ध्यान देना भी आवश्यक है।

छंटाई और देखभाल

समय-समय पर छंटाई करने से पौधों का आकार संतुलित रहता है और उत्पादन बेहतर होता है। सूखी और रोगग्रस्त शाखाओं को तुरंत हटा देना चाहिए। नई पत्तियों और कोपलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों पर नियंत्रण जरूरी है।

फसल तुड़ाई और उपज

काजू के पेड़ चौथे वर्ष से फल देना शुरू कर देते हैं, जबकि अच्छी उपज लगभग दसवें वर्ष से प्राप्त होती है।

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  • प्रति पेड़ 10–15 किलोग्राम नट
  • 70–100 किलोग्राम काजू सेब

कटाई का समय फरवरी से मई तक रहता है। केवल गिरे हुए नट्स को एकत्र किया जाता है। उन्हें धूप में अच्छी तरह सुखाकर जूट की बोरियों में भरकर सूखी और ऊंची जगह पर संग्रहित किया जाता है, ताकि नमी से बचाव हो सके।

काजू के पोषण और औषधीय लाभ

काजू स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पोषक तत्वों से भरपूर होता है:

  • मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायक
  • हड्डियों और रक्त स्वास्थ्य के लिए लाभकारी
  • सूजन और दर्द कम करने में उपयोगी
  • कैंसर से बचाव में सहायक बायोएक्टिव तत्व

इसमें प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स और हेल्दी फैट्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जिससे यह एक पौष्टिक सुपरफूड माना जाता है।

निष्कर्ष

काजू की खेती किसानों के लिए एक लाभदायक और दीर्घकालिक व्यवसाय है। यदि सही किस्मों का चयन, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और उचित देखभाल की जाए, तो उच्च उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। भारतीय काजू की बढ़ती वैश्विक मांग को देखते हुए भविष्य में इसका निर्यात और मुनाफा और अधिक बढ़ने की संभावना है।

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काजू की वैज्ञानिक खेती अपनाकर किसान अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं।

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