हल्दी की टॉप 5 उन्नत किस्में: ज्यादा पैदावार के साथ डबल मुनाफा

Published On: February 16, 2026
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Top 5 improved turmeric varieties

हल्दी भारतीय मसालों में विशेष महत्व रखती है। यह केवल खाने का स्वाद और रंग बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि औषधीय गुणों और धार्मिक उपयोगों के कारण इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है। भारतीय रसोई में हल्दी के बिना व्यंजन अधूरे माने जाते हैं, इसी वजह से इसे “गोल्डन स्पाइस” भी कहा जाता है।

हल्दी में पाया जाने वाला करक्यूमिन (Curcumin) तत्व शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है और आयुर्वेदिक औषधियों में इसका व्यापक उपयोग होता है।

किसानों के लिए हल्दी एक लाभदायक नकदी फसल है, क्योंकि इसकी मांग घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार बनी रहती है। एक बार सही तरीके से खेती करने पर यह लंबे समय तक अच्छा मुनाफा देती है। मई से जून का समय हल्दी की बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

आइए जानते हैं हल्दी की 5 ऐसी उन्नत किस्मों के बारे में, जो कम समय में तैयार होती हैं और अधिक उत्पादन देती हैं।

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1. सिम पीतांबर किस्म

यह किस्म किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। इसे केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा अनुसंधान संस्थान (CIMAP) द्वारा विकसित किया गया है।

  • उत्पादन क्षमता: लगभग 65 टन प्रति हेक्टेयर।
  • तैयार होने की अवधि: 7 से 9 महीने।
  • विशेषता: इस किस्म में कीटों का प्रकोप कम होता है और पत्तियों पर धब्बा रोग का असर भी कम देखने को मिलता है।
  • लाभ: बेहतर गुणवत्ता और अधिक उपज के कारण बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं।

2. सुंगधम किस्म

यह किस्म अपने आकर्षक कंद और हल्की सुगंध के कारण किसानों की पसंद बनी हुई है।

  • उत्पादन क्षमता: 80 से 90 क्विंटल प्रति एकड़।
  • तैयार होने की अवधि: लगभग 210 दिन।
  • विशेषता: इसके कंद लंबे और हल्के लालपन लिए पीले रंग के होते हैं।
  • लाभ: सुगंध और गुणवत्ता के कारण बाजार में इसकी मांग अधिक रहती है, जिससे किसानों को बेहतर आमदनी मिलती है।

3. सोरमा किस्म

यह वैरायटी अपनी गहरी रंगत और अच्छी पैदावार के लिए जानी जाती है।

  • उत्पादन क्षमता: 80 से 90 क्विंटल प्रति एकड़।
  • तैयार होने की अवधि: लगभग 210 दिन।
  • विशेषता: इसके कंद नारंगी रंग के होते हैं, जो बाजार में ज्यादा आकर्षण पैदा करते हैं।
  • लाभ: निर्यात के लिए उपयुक्त मानी जाती है, क्योंकि विदेशी बाजार में नारंगी रंग की हल्दी की मांग ज्यादा रहती है।

4. सुदर्शन किस्म

यह किस्म जल्दी तैयार होने और उच्च उत्पादन के कारण खास पहचान रखती है।

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  • उत्पादन क्षमता: 110 से 115 क्विंटल प्रति एकड़।
  • तैयार होने की अवधि: लगभग 190 दिन।
  • विशेषता: इसके कंद आकार में छोटे लेकिन आकर्षक होते हैं।
  • लाभ: जल्दी पकने से किसान समय पर फसल बेच सकते हैं और अगली फसल की तैयारी भी कर सकते हैं।

5. आरएच-5 किस्म

यह किस्म सबसे अधिक उत्पादन देने वाली प्रमुख किस्मों में गिनी जाती है।

  • पौधे की ऊंचाई: 80 से 100 सेंटीमीटर।
  • उत्पादन क्षमता: 200 से 220 क्विंटल प्रति एकड़।
  • तैयार होने की अवधि: 210 से 220 दिन।
  • विशेषता: बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती के लिए उपयुक्त।
  • लाभ: अधिक पैदावार के कारण किसानों को ज्यादा लाभ मिलता है।

हल्दी की बुवाई की प्रमुख विधियां

बेहतर उत्पादन के लिए सही बुवाई तकनीक अपनाना जरूरी है। आमतौर पर दो प्रमुख तरीके अपनाए जाते हैं:

1. समतल विधि

सबसे पहले खेत की गहरी जुताई करके उसे समतल किया जाता है।

  • पंक्ति से पंक्ति की दूरी: 30 सेमी
  • कंद से कंद की दूरी: 20 सेमी

इस विधि में बुवाई और निराई-गुड़ाई दोनों आसान रहती हैं।

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2. मेढ़ विधि

इस पद्धति में मेढ़ बनाकर बुवाई की जाती है। इसमें दो तरीके अपनाए जाते हैं:

(क) एकल पंक्ति विधि

  • 30 सेमी चौड़ी मेढ़ पर 20 सेमी की दूरी पर कंद लगाए जाते हैं।
  • ऊपर से लगभग 40 सेमी मिट्टी चढ़ाई जाती है।

(ख) दो पंक्ति विधि

  • 50 सेमी चौड़ी मेढ़ पर दो पंक्तियां बनाई जाती हैं।
  • पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी और कंद से कंद की दूरी 20 सेमी रखी जाती है।
  • इसमें लगभग 60 सेमी मिट्टी चढ़ाई जाती है।

बुवाई के समय जरूरी सावधानियां

  • 30 से 35 ग्राम वजन वाले स्वस्थ और रोगमुक्त कंदों का चयन करें।
  • कंदों को 5–6 सेमी गहराई पर लगाएं।
  • रोपण से पहले कंदों को इंडोफिल एम-45 (2.5 ग्राम) और वेभिस्टीन (1 ग्राम) प्रति लीटर पानी के घोल में 30–45 मिनट तक उपचारित करें।

इस प्रक्रिया से रोगों का खतरा कम होता है और अंकुरण बेहतर होता है।

निष्कर्ष

हल्दी की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प है। सिम पीतांबर, सुंगधम, सोरमा, सुदर्शन और आरएच-5 जैसी उन्नत किस्मों को अपनाकर किसान कम समय में ज्यादा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं। बाजार में हल्दी की मांग पूरे वर्ष बनी रहती है, जिससे इसकी बिक्री में नुकसान की संभावना बहुत कम रहती है।

सही किस्म का चयन और वैज्ञानिक बुवाई तकनीक अपनाकर किसान अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं।

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